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अंतिम पहर

  1. रात का अंतिम पहर खत्म होने को हैं,पर आँखों से नींद कोसों दूर है। हर पल तुम्हारे साथ जो गुजारा चलचित्र के जैसे आँखों के सामने से गुजर रहा हैं, कभी होंठो पर मुस्कान तो कभी नीर बनकर आँखों से बह रहा । तुम भूल गए कि कुछ भी कहने का मुझे अधिकार मैंने ही तुम्हें दिया था । इसलिए तुम कहते रहें और मैं सुनती रहीं मूक नही हूं पर मूक बनी रही शायद ढूंढ़ रही थी वो विश्वास जो था या था ही नही कभी । मैंने अपने दायरे तुम तक सीमित कर लिए भूल गयी अपना जहॉ ….तुमसे मिला जो भी उसी में तलाशती रही खुद का वजूद….पर ये रात का अंतिम पहर जहाँ सिर्फ मैं हूं और तुम्हारी यादें । तुम्हें प्यार करके खुद से दूर हो गयी।  मेरी आजादी मेरा सम्मान सब तो अर्पण था , मेरी सोच मेरी इच्छाएं सब तो कुबान थी फिर क्यों विश्वास की धारा पर मेरी बलि चढ़ा दी गयी। 

     तुम भूल गए नैसर्गिक रूप से मुझे वरदान मिला हैं सृष्टि का ,  बीज को पोषित पल्ल्वित करने का वरदान ।  तुम्हारे भी हर दुख को खुद में समा कर तुम्हें मुक्त करती हूँ हर बन्धन से । मैं धरा हूँ हर दुख को सहने का हुनर मुझे आता हैं । ये रात का अंतिम पहर समाप्ति की ओर हैं और मैंने यादों के पिटारे में कुछ यादें सँजो कर रख ली हैं, 

 कुछ खट्टे मीठे अहसान कुछ एक हँसी के पल कुछ आँखों के आंसू ,बस ये सौगात मेरी तुमसे मिली…

  

चलो अच्छा हुआ

चलो अच्छा हुआ 

आखिर तुमने माना तो

कि हमारे रास्ते जुदा हो गए….

मंजिल तो थी नही अब रास्ते भी खो गए

खुश हूं कि तुम खुश हो …

अपनी ख्वाहिशों को समेट कर

जा रही हूँ दूर… 

कभी मिलेंगे तो अजनबी जैसे

पता नही कैसे मना पाऊंगी

अपने दिल को कि तुम नही हो अब मेरे

हाँ तुम नही हो अब मेरे..

एक झूठी आस और टूटे सपने

छोड़ जा रही हूँ पास तुम्हारे…

तुम याद आओगे जब तो तड़फ जाऊंगी

रह रह कर तेरा ख्याल जब सतायेगा…

आख़िर क्यों😢

  • डॉ पुनिता ने कमरे में कदम रखा ही था कि वहाँ के अंधेरे और नीरवता ने उनके अंदर सिरहन पैदा कर दी। बड़ी मुश्किल से देखने पर एक परछाई दिखाई दी जो दीवाल की तरफ मुँह करके गुमसुम बैठी थी।दुनिया से बेख़बर, बिखरे बाल, सूखे होंठ, धंसी हुई आंखे जिनके आँसू सूख चुके थे। ये मीना थी, जिसकी ऐसी हालत देखकर डॉ पुनिता का कलेजा मुँह को आने लगा। एक पल को लगा जैसे गश खाकर गिर ना जाये, फिर खुद को सम्भालती हुई मीना की तरफ बढ़ी।मीना की माँ और डॉ पुनिता बचपन की सहेलियां हैं। मीना की तो खास प्यारी आंटी हैं डॉ पुनिता। बचपन से ही उसके मुंह लगी थी मीना। कोई भी बात हो जब तक उनको बता नही देती तब तक उसको चैन ना पड़ता। इसीलिये मीना की माँ ने उनको बुलाया था मीना को समझाने ….ताकि मीना के साथ जो हादसा हुआ है उससे बाहर निकले और अपनी जिंदगी फिर से शुरू करें।

    वैसे सबके लिए ये एक हादसा हो सकता हैं पर मीना की तो दुनिया ही तबाह हो गई थी। उसके सब अरमान, सपने,इच्छाएं सब उस हादसे की भेंट चढ़ गए । 

     

       हम सब जानते हैं करने वालो ने उसके साथ बहुत बुरा किया। पर क्या कभी वो उसके साथ हुए इस अनर्थ से बाहर निकल पाएगी? उसकी आत्मा पर लगा जख्म कभी ठीक होगा? क्या फिर से उसकी वो निश्छल हँसी गूँजेगी?

    आज वो अपना नाम भी खो चुकी । ‘ बलात्कार की शिकार ‘ हाँ यही पहचान बन गयी हैं। आजकल उसको जो भी देखता हैं कोई आँखों ही आँखों मे हजारों सवाल करता है तो कोई अपने शब्दों से घाव कुरेद देता है।
    डॉ पुनिता ने जैसे ही मीना के कंधे पर हाथ रखा वो सहम कर अपने में सिमट गई। डॉ पुनिता ने प्यार से बालों पर हाथ फेरते कहा , ” बेटू मैं हूँ तुम्हारी डॉ आँटी” !! इतना सुनते ही मीना डॉ की गोदी चिपककर जोर जोर से रोने लगी। शायद इससे ज्यादा वो इस वक्त कर भी क्या सकती थी। सारे शब्द मौन हो गए डॉ पुनिता के क्या कह कर तसल्ली दे उसको, बस धीरे धीरे उसकी पीठ पर हाथ फेरती रही। शायद रो लेने से उसके अंदर जो गुबार भरा है वो निकल जाए!  पर क्या इतना आसान है सबकुछ भुला पाना? क्या कभी भूला जा सकता हैं उस अमानवीय कृत्य को? गिजगिजे हाथों की छुअन, कानों में गूँजते अट्टाहास, बदन पर पड़ने वाले नोंचते खसोटते हाथों को? क्या समय ये सब उसकी आत्मा से कभी मिटा पायेगा? एक दिन लोगों की मिलने वाली संवेदनाये समय के साथ कम हो जाएंगी, पर समाज की नजरें तो वही रहेगी।
    रोते रोते मीना का गला रूँध गया पर डॉ पुनीता उससे एक शब्द ना कह पायी  बिना सांत्वना, तसल्ली दिए, चुपचाप बिना कुछ कहे वापस लौंट आयी। हजारों सवालों के साथ –  क्या था कसूर उस मासूम सी बच्ची का? उसके सपने, उसकी ख्वाहिशें, उसकी हँसी, उसकी मासूमियत, क्या फिर से अपनी उड़ान भर पाएंगे?  जिस्म पर लगे घाव तो समय के साथ भर जायेगे पर क्या उसकी आत्मा पर जो घाव कुरेदे गए है, उनसे कभी उभर पाएगी?

    किस दुनिया से आते हैं ऐसी पाशविक मानसिकता के लोग क्या उनके पास ज़मीर, दया इंसानियत नही होती । जिस खुशी सन्तुष्टि की उनको तलाश होती है क्या किसी की इज्जत लूट कर मिल जाती
    लड़की होना अभिशाप हैं तो देवी को क्यों पूजा जाता हैं? क्यों आधी आबादी के बीच रहने वाले लोग ही औरत की इज्जत, उसका सम्मान नही कर सकते? कब तक? आखिर कब तक खिलौना समझा जाता रहेगा? कब तक मीना जैसे लड़कियों को जीते जी मौत दी जाती रहेगी?

“तसल्ली”  झूठी उम्मीदों से भरी ये जिन्दगी..                           तसल्ली कि तुम साथ हो..  सिर्फ एक अहसास हो..  खत्म हो जाएगा ये सफ़र खुश होने का..                   ये भृम मिट जाएगा जिस दिन..                                 छोड़ जाऊंगी एक दिन सब उम्मीदों को..                      पुर सुकून की नींद में सो जाऊँगी..                        एक तारा बनकर तुझे ही निहारा करूँगी..               इस यकीं से कि तूने ना सही मैने तो मोहब्बत की थीं.. तेरे ख्वाब ओ ख्याल से सजाई थी दुनिया अपनी..माहिर थे हर बार जीतते गए तुम..पर भूल गए मैं हारी इसलिए तुम जीत गए हर बाजी..खुश थी कि तुम जीत गए..क्योंकि मोहब्बत तो मैंने की थी…       

*सैनिक*जैसे जैसे रात गहरा रही थी वैसे वैसे  की आँखों से आंसू बह रहे थे मयंक को गए आज पूरे 2 महीने हो गए है ,पर उसको एक पल को न भूल पायी भूले भी तो कैसे इतना प्यार जो करता था उसका दिन उसी से शुरू होता और रात भी उसी से होती। उसका मन तड़फता रहता हैं उसके बिना जीना कितना मुश्किल होगा ये सोचा भी नही था । इस रात के अंधेरे में जोर जोर से चिल्लाना चाहती है प्लीज मयंक तुम जहाँ भी हो आ जाओ या मुझे अपने साथ ले जाओ । हमारा प्यार हमारे सपने सब बिखर गए जो साथ जीने मरने की कसमें हर हाल में साथ निभाने के वादे सभी तो खत्म हो गए । दुश्मन की एक गोली ने उसके संसार मे आग लगा दी । दो देशों की दुश्मनी ने उसका हँसता खेलता संसार खत्म कर दिया , दुश्मन की गोली ने केवल मयंक को नही मारा बल्कि उसके साथ उसके माता पिता और पीहू की जान भी ले ली।  सरहदों की इस लड़ाई में बेटे को माँ बाप से अलग कर दिया पीहू की तो दुनिया ही मयंक से शुरू होती थी उसी पर खत्म उसके जीने का मकसद ही खत्म हो गया। जीने की कोई ललक ना रह गयी थी उसमें एक बेजान लाश के जैसी जी रही थी।             अपना दुख किसके सामने रोये बूढ़े सास ससुर पहले ही बेटे की मौत से टूट चुके हैं । उनके सामने खुश होने का नाटक करती है पर अंदर ही अंदर टूटती जाती है।  हर चीज आज भी संभाल कर रखी है मयंक की यादों के साथ । उसे आज भी याद है उसका पहला करवाचौथ का व्रत, उसको आदत नही थी व्रत बगैरा की मयंक उस दिन उसके साथ हर पल थे जैसे तैसे शाम हुई उसकी तबियत बिगड़ने लगी थी कितना समझाया था मयंक ने कि थोड़ा पानी पी लू कुछ नही होगा पर वो उसकी गोद मे सर रखे लेटी रही खुद को बहुत नसीब वाली समझ रही थी उसका पति कितना प्यार करता हैं कितना ख्याल रखते हैं । रात को कितने प्यार से मयंक ने ही उसका श्रृंगार किया आखिरी में बाहों को उसके गले मे डाल बोले “चलिए महारानी अब क्या चाँद को इंतजार कराएगी” ।         उसके सूने जीवन मे ये यादे ही है उसका सहारा है हर पल उसका मन ये ही कहता है तुम जहाँ हो आ जाओ वापस,  नही जी सकती तुम्हारे बिना । पर ये तड़प कभी खत्म नही होगी । लोगों के द्वारा बनाई सरहदों के दोनों और  मरता तो बेटा, भाई, पति और पिता है उसके साथ मरते हैं उसके घर वाले ।

कसक

अपने ही ख्यालो में खोई धीरे धीरे चाय के घूट पीती नन्दनी अपनी ही दुनिया मे खोई थी।  हवा के साथ बारिश की बुंदे उसके चेहरे को भिगो रही थी। यादों का सिलसिला जैसे थमने का नाम नही ले रहा था। पता नही क्यों आज सूरज की याद बहुत आ रही थी जबकि वर्षों से उसकी कोई खबर नही है वो कहां हैं किस हाल में है। ख्यालों में डूबी सोच रही थी उसे बारिश में भीगना कितना अच्छा लगता था पर सूरज कभी उसको ऐसा नही करने देते। हमेशा मना करते तरह तरह की दलीलें देकर उसको भीगने नही देते थे उस वक्त उसे सूरज पर प्यार और गुस्सा दोनो आते। उसकी फिक्र करने का ये अंदाज उसे ऐसा करने के लिए खुद को रोक लेती। यादों की बेड़ियां उसे जकड़ती जा रही थी, शायद वो खुद इन यादों से नही निकलना चाहती थी। क्या कमी थी हमारे प्यार में क्यों एक नही हो पाए क्यों भाग्य हमारे प्यार का नसीब तय करता हैं। अगर सब ठीक होता तो आज हम भी अपने सूरज अपने प्यार के साथ खुश रहते । पर भाग्य को तो कुछ और ही मंजूर था। ऐसा नही कि उसके जीवन मे प्यार नही पर वो सुकून नही जो सूरज के सीने से लग कर मिलता था। उसे अच्छी तरह याद हैं सूरज को छत पर लेट कर सितारे देखना बहुत भाता था तो उसे उसके सीने से लग कर उसकी आवाज में खोना उसके कहे एक एक शब्द को अपने अंदर समा लेना चाहती हो जैसे । आज भी उस आवाज की तलाश है उसे और ये भी पता है ये इंतजार बस इंतजार ही रहेगा जो कभी खत्म नही होगा। “माँ भूख लगी हैं खाना दीजिये न” इस आवाज ने यादों से बाहर ला दिया वो अपनी सोच अपनी यादों से वापस अपनी दुनिया मे आ गई।  अपनी बेटी को सीने से लगा कर उठ खड़ी हुई अपने कर्तव्य निभाने अपने फर्ज पूरे जो करने हैं ।एक फीकी मुस्कान के साथ यादों से निकल काम मे लग गयी।

जीवन-

वेतन के पैसों को हाथ मे लिए सोचते – सोचते रमेश ऑफिस से बाहर निकल सड़क पर आ गया, पर सोच खत्म नही हुई,सोच रहा था, आज एक जोड़ी जूते खरीद ही लूं पुराने बिल्कुल फट गए है सुनीता कितनी बार नये लेने के लिए कह चुकी हैं अब की बार तो मोची ने भी मना कर दिया जूते सुधारने से सिलने की जगह ही नही बची।सोचते सोचते जूतों की दुकान भी आ गयी जैसे ही अंदर जाने के लिए पैर आगे बढ़ाया बेटी के कहे शब्द याद आने लगे,”पापा आज गुड़िया जरूर लाना जैसी नीलू के पास है गुलाबी फ्रॉक वाली रेशमी बालो वाली” अपनी लाड़ली की मासूम सी फरमाइश जेहन में उतरते ही हल्की सी मुस्कान उसके होंठो पर तैर गयी। अपनी गुड़िया के लिए गुड़िया जरूर ले जानी हैं जूते फिर कभी अभी तो काम चल ही रहा हैं और एक लंबी सांस लेकर खिलौने की दुकान की तरफ बढ़ गया ।